अतिशयोक्ति
ये कहना कोई अतिश्योक्ति नही होगी कि जब
कांग्रेस जीरो होने लगी, तो अपने चाटुकार
साहित्यकारों को मोदी के मुंह पर कालिख पोतने के लिए आगे
खड़ा कर दिया --अभी तक 21 लोगों ने अपने अवार्ड वापस
करने की घोषणा की है और ये यकीन
से कहा जा सकता है कि 10 जनपथ के इशारों पर ये खेल खेल जा रहा
है -- इसकी शुरुआत नेहरू खानदान की नयनतारा
सहगल ने की --और उसके बाद औरों के भी
दर्द हुआ -एक दो के बयान पढ़ कर साबित हो गया कि ये किसके इशारो पर
कर रहे हैं और ये खुद कितने गिरे हुए लोग हैं -- हिंदी
कवि मंगलेश डबराल और राजेश जोशी ने कहा है -- “We
clearly see a threat to our democracy, secularism and
freedom. There have been attempts to curb free speech
earlier also, but such trends have become more
pronounced under the present government. These are
visible all over,” ऐसी ही और लोगों ने
भी की है --अल्पसंख्यक सुरक्षित
नही है और अभिव्यक्ति की आज़ादी
पर चोट पड़ रही है -- जम्मू कश्मीर के
लेखक ग़ुलाम नबी ख्याल ने कहा-- “I have decided to
return the award. The minorities in the country are
feeling unsafe and threatened. They feel their future is
bleak" “The government has failed in fulfilling its duty of
protecting the minorities as enshrined in the
Constitution of the country,” ख्याल मियां, आज अल्पसंख्यकों
की सुरक्षा की चिंता हो रही है, तो
फिर कश्मीरी पंडितों पर हुए जुल्म और जुर्म पर
तुम्हारी आँख में आंसू क्यों नही आये --और
तुम्हारे पड़ोस के मुल्क पाकिस्तान में हुए हिन्दुओं पर अत्याचारों पर
भी कभी ख़्याल कर लेते -आपने साबित कर दिया
आप जैसे लोग एक घटिया मानसिकता से पीड़ित हो जिनका
लक्ष्य केवल मोदी को बदनाम करना है -- अशोक
वाजपेयी समेत इन तमाम साहित्यकारों को कभी
1984 में मारे गए सिक्खों और कश्मीर से खदेड़े गए हिन्दुओं
का ख्याल नही आया --जो अपने अवार्ड वापस करते --तब
तो लगता है ये लोग अवार्ड्स को अपने सीने से लगाये रहे
और तालियां बजाते रहे -- 10 जनपथ को इन साहित्कारों को उकसाने से
पहले नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव
गांधी के भारत रत्न वापस कर देने चाहियें -- डबराल,
जोशी और अन्य महानुभावों को मैं बताना चाहता हूँ कि अगर
देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कोई खतरा होता
तो आज सारे मीडिया चैनल भांड मिरासियों की हर
वक्त मोदी की खिलाफ बक बक ना करते --हालत
ये है कि पाकिस्तान की हर गलती को नज़र
अंदाज करके वहां का मीडिया पाकिस्तान के खिलाफ कुछ
नही बोलता और यहाँ हमारा मीडिया हर समय
मोदी को कोसने में लगा रहता है -- अगर इन साहित्यकारों को
लगता है कि ये लोग अपने अवार्ड वापस करने का ड्रामा करके प्रधान
मंत्री मोदी को अपमानित कर लेंगे तो यह
इनकी भूल है --इन महानुभावों को मोदी के भाषण
ध्यान से सुनने चाहियें और तब पता चलेगा कि मोदी इन
सभी से बड़े साहित्यकार हैं, वो दूरदर्शी हैं,
आध्यात्मिक गुरु हैं दूसरों का आदर करते हैं जिसकी वजह
से वो आज समाज के हर तबके के दिलों में बैठे हैं --आप लोग चाँद पर
थूकने का प्रयास ना करें -- साहित्य अकादमी को चाहिए कि वो
या तो ये सम्मान देने बंद कर दे--या भविष्य में कोई अवार्ड वापस न कर
सके ऐसी शर्त लगा दे - ये लेख मैं साहित्य
अकादमी को मेल कर रहा हूँ इस अनुरोध के साथ कि एक
प्रतिलिपि सभी अवार्ड वापस करने वालो को भेज दी
जाये ।
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